Wednesday, 4 September 2013

लघु कथा : जय जय निराशा माई-जय जय पाखंडी बाबा की अधमाई

पुत्र रत्न की प्राप्ति हेतु आसक्त निराशा देवी ने पाखंडी बाबा से एक पाख तक यग्य कराया, और अंतत:  पुत्र रत्न पाया ।

कहीं दस वर्षों बाद गुरु दक्षिणा चुकाने की बारी आई ।  सपरिवार पुन: उसी यग्य मढैया में जा पहुंची ।
अपनी बड़ी बेटी को बाबा की सेवा में लगाई ।

 जय जय निराशा माई-जय जय पाखंडी बाबा की अधमाई-
पर यह बात पिता को रास ना आई-और उसने  दिल्ली में एक अर्जी लगवाई । महंगी पड़ी बाबाई-